Home उत्तराखंड वनाग्नि विहिन हिमालय अभियान – ये आग आखिर कब बुझेगी- — डॉ. किशोर कुमार पंत
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वनाग्नि विहिन हिमालय अभियान – ये आग आखिर कब बुझेगी- — डॉ. किशोर कुमार पंत

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पिथौरागढ़ ,सामाजिक चिंतक एवं निदेशक, अभिलाषा समिति, पिथौरागढ़, उत्तराखंड डॉ. किशोर कुमार पंत का कहना है की

हिमालय केवल पहाड़ों की भौगोलिक शृंखला नहीं है; यह भारत की जल सुरक्षा, जलवायु संतुलन, जैव विविधता और सांस्कृतिक अस्तित्व का जीवंत आधार है।

देश की प्रमुख नदियाँ इसी हिमालय से निकलती हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका, खेती और जीवन इससे जुड़ा हुआ है।

परंतु विडंबना यह है कि हर वर्ष गर्मियों के आते ही यही हिमालय आग की लपटों में घिर जाता है। जंगलों से उठता धुआँ केवल पेड़ों को नहीं जलाता, बल्कि वह भविष्य की संभावनाओं, पर्यावरणीय संतुलन और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को भी झुलसा देता है।

हर साल वही प्रश्न फिर सामने खड़ा हो जाता है—ये आग आखिर कब बुझेगी? और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जब समस्या का कारण समाज है, तो जिम्मेदारी केवल विभाग की क्यों मानी जाए?

वन विभाग निश्चित रूप से वन संरक्षण का प्रमुख संस्थान है। उसके पास कानून हैं, तकनीकी संसाधन हैं और प्रशासनिक ढांचा भी है। लेकिन हिमालयी क्षेत्रों में फैले विशाल जंगलों की निगरानी केवल सरकारी तंत्र के भरोसे संभव नहीं। जंगल केवल सरकारी संपत्ति नहीं हैं, वे जन संपत्ति हैं। उनका अस्तित्व समाज के जीवन से जुड़ा है, इसलिए उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सामूहिक होनी चाहिए।

वनाग्नि की घटनाओं का अध्ययन बताता है कि अधिकांश आग मानवजनित होती है। यानी यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही और उदासीनता का परिणाम है। कहीं बीड़ी या सिगरेट की चिंगारी से आग लगती है, कहीं माचिस की बुझी न हुई तीली से, कहीं पिकनिक के बाद छोड़े गए अलाव से, तो कहीं हरी घास उगाने के लालच में जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है। जब आग हमारे ही हाथों से लगती है, तो उसका समाधान भी सामूहिक जिम्मेदारी से ही संभव है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आम जन वनाग्नि के प्रति इतना उदासीन क्यों है। इसका उत्तर समाज के बदलते संबंधों में छिपा है। कभी पहाड़ों में जंगल जीवन का हिस्सा हुआ करते थे। ईंधन, चारा, जल और औषधि सब जंगल से मिलते थे। जंगलों से सीधा रिश्ता था, इसलिए संरक्षण की भावना भी थी। लेकिन आधुनिक जीवन शैली ने जंगल और समाज के बीच मानसिक दूरी पैदा कर दी। आज जंगलों को लोग अपनी विरासत नहीं, बल्कि सरकार की संपत्ति समझने लगे हैं।
जब किसी संसाधन से प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिलता, तो उसके संरक्षण की भावना भी कमजोर हो जाती है। जंगल यदि केवल प्रतिबंधों और नियमों का प्रतीक बन जाए, तो समाज उसमें अपना हित नहीं देख पाता। यही कारण है कि वनाग्नि का वास्तविक प्रभाव भी लोग पूरी तरह समझ नहीं पाते। जंगल जलने का असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर बारिश पर पड़ता है, जल स्रोत सूखते हैं, खेती प्रभावित होती है, तापमान बढ़ता है और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। फिर भी वनाग्नि को अक्सर स्थानीय घटना समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि यह जलवायु संकट का गंभीर संकेत है।
जागरूकता के लिए पोस्टर, बैनर और नुक्कड़ नाटक जैसे अभियान चलाए जाते हैं, पर उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि ये अभियान अक्सर मौसमी होते हैं, निरंतर नहीं। इनमें समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी कम होती है और सबसे बड़ी कमी यह है कि जागरूकता को आजीविका से नहीं जोड़ा गया। जब तक जागरूकता व्यक्ति के हित से नहीं जुड़ती, तब तक वह व्यवहार परिवर्तन में परिवर्तित नहीं होती।

वनाग्नि के खिलाफ कठोर कानूनों और दंड की मांग भी उठती रही है। यह मांग उचित है क्योंकि जो व्यक्ति जंगल में आग लगाता है, वह केवल पेड़ नहीं जलाता, बल्कि जल स्रोत, पशुधन, कृषि और जैव विविधता को भी नष्ट करता है। कठोर कानून भय पैदा कर सकते हैं, लापरवाही कम कर सकते हैं और जानबूझकर आग लगाने वालों को रोक सकते हैं। लेकिन कानून अकेले व्यवहार परिवर्तन नहीं कर सकता। व्यवहार तब बदलता है जब व्यक्ति का हित उससे जुड़ता है और उसे जिम्मेदारी का एहसास होता है।
पर्यटन के बढ़ने के साथ एक नई चुनौती सामने आई है। सड़कों के विस्तार और वाहनों की बढ़ती संख्या के साथ लापरवाही भी बढ़ी है। चलती गाड़ी से फेंकी गई एक चिंगारी सूखी चीड़ की पत्तियों पर गिरते ही कुछ ही मिनटों में जंगल को आग के हवाले कर देती है। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि अज्ञान और असंवेदनशीलता का परिणाम है। ऐसी घटनाएँ तब रुकेंगी जब निगरानी मजबूत होगी, दंड कठोर होगा और समाज स्वयं इसका विरोध करेगा।
वनाग्नि रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय है—जंगलों को आजीविका से जोड़ना। दुनिया के सफल संरक्षण मॉडल बताते हैं कि जहाँ जंगल लोगों की आय का स्रोत बने, वहाँ उनका संरक्षण स्वतः सुनिश्चित हो गया। जब ग्रामीण को यह महसूस होगा कि जंगल जलने से उसकी आय समाप्त हो जाएगी, तब वह स्वयं जंगल बचाने के लिए आगे आएगा।
हिमालय औषधीय पौधों का खजाना है। यदि जड़ी-बूटी आधारित अर्थव्यवस्था विकसित की जाए, सामुदायिक खेती को बढ़ावा दिया जाए और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित हों, तो जंगल आर्थिक पूंजी बन सकते हैं। जब जंगल आय का स्रोत बनेंगे, तब उनका संरक्षण स्वाभाविक रूप से होगा।
वनाग्नि का एक बड़ा कारण हरी घास उगाने के लिए लगाई गई आग भी है। यदि गांवों के पास चारा प्लांटेशन, फोडर बैंक और चारा नर्सरी विकसित कर दी जाएँ, तो जंगल में आग लगाने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी। यह समाधान सरल, व्यावहारिक और प्रभावी है।
मधुमक्खी पालन भी वन संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। मधुमक्खियाँ फूलों पर निर्भर हैं और फूल जंगलों पर। जहाँ मधुमक्खी पालन होगा, वहाँ लोग जंगल जलने नहीं देंगे क्योंकि जंगल का विनाश उनकी आय का विनाश होगा। यही भागीदारी आधारित संरक्षण का वास्तविक मॉडल है।
यदि हर गांव में सामुदायिक नर्सरी, वन मित्र दल और युवा फायर वॉच टीम बनाई जाए, तो वनाग्नि की घटनाएँ काफी हद तक कम हो सकती हैं। यह केवल योजना नहीं, बल्कि जन आंदोलन का रूप ले सकता है।
अब समय आ गया है कि वनाग्नि रोकथाम का नया सूत्र अपनाया जाए—जागरूकता, कठोर कानून, आजीविका और सामुदायिक भागीदारी का समन्वय। इन चारों में से एक भी घटक कमजोर हुआ, तो आग फिर भड़क उठेगी।
वनाग्नि केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है; यह अस्तित्व का प्रश्न है। यह पानी, खेती, जलवायु और आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है। यदि हिमालय जलता रहा, तो मैदान भी सुरक्षित नहीं रहेंगे।
अब यह स्वीकार करने का समय है कि वन संरक्षण कोई सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। हर नागरिक को यह संकल्प लेना होगा कि वह जंगल में आग नहीं लगाएगा, आग लगाने वालों को रोकेगा और वन संरक्षण में सक्रिय भागीदारी करेगा।
अंततः यह आग तब बुझेगी जब सरकार, समाज और गांव मिलकर इसे बुझाने का संकल्प लेंगे। जब जंगल सरकारी जमीन नहीं, बल्कि हमारी साझा विरासत बनेंगे। जब हिमालय को बचाना एक योजना नहीं, बल्कि जन आंदोलन बन जाएगा। तब सच में कहा जा सकेगा—हिमालय जल नहीं रहा, हिमालय बच रहा है।

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