Home उत्तराखंड नंबरों का बाजार बंद करें — शिक्षा को प्रचार नहीं, उद्देश्य चाहिए -डॉ किशोर कुमार पंत,
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नंबरों का बाजार बंद करें — शिक्षा को प्रचार नहीं, उद्देश्य चाहिए -डॉ किशोर कुमार पंत,

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उत्तराखंड पिथौरागढ़ -डॉ किशोर कुमार पंत
निदेशक अभिलाषा समिति, पिथौरागढ़, उत्तराखंड का कहना है की सीबीएसई बोर्ड का परिणाम घोषित होते ही हर वर्ष की तरह इस बार भी स्कूलों के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अखबारों के पन्ने चमक उठे।

100%, 99.8%, 99.5%, 98% और 97%—प्रतिशतों की ऐसी आतिशबाज़ी कि मानो शिक्षा नहीं, किसी प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन का उत्सव मनाया जा रहा हो।

मुस्कुराते चेहरे, मेडल, फूलों के गुलदस्ते और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे वाक्य—“हमारे टॉपर”, “100% रिजल्ट”, “जिला टॉपर”।

पर इस चमक के पीछे एक सच्चाई है जिसे देखने की ईमानदार कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। यह वह सच्चाई है जो उन लाखों बच्चों के मन में चुपचाप दर्द बनकर बैठ जाती है जिन्होंने 90%, 80%, 70% या 60% अंक प्राप्त किए हैं। और विडंबना यह है कि 60% अंक प्राप्त करने वाला छात्र भी हमारी शिक्षा प्रणाली के अनुसार प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता है।
फिर भी वह मंच से गायब है। पोस्टरों से गायब है। विज्ञापनों से गायब है।

यहीं से शुरू होता है शिक्षा का मौन संकट—नंबरों का बाजार।
प्रथम श्रेणी का अपमान
सीधा प्रश्न है—जब 60% वाला छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण है, तो उसे सार्वजनिक मंचों से क्यों गायब कर दिया जाता है? क्या प्रथम श्रेणी अब केवल 95% से ऊपर वालों के लिए सुरक्षित हो चुकी है? क्या 90% पाने वाला छात्र अब औसत हो गया है? क्या 80% पाने वाला छात्र अदृश्य हो चुका है?

आज का सबसे कड़वा सच यह है कि 90% अंक पाने वाला छात्र भी खुश नहीं है। वह भीतर ही भीतर टूट रहा है। उसे लग रहा है कि वह पीछे रह गया। उसने पर्याप्त मेहनत नहीं की। वह पर्याप्त अच्छा नहीं है।
यह सोच अचानक पैदा नहीं हुई। इसे लगातार बनाया गया है—और इसमें स्कूलों की प्रचार संस्कृति की बड़ी भूमिका है।

सैकड़ों छात्रों में से केवल पाँच चेहरे
जो स्कूल हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के चार-चार बैच चलाते हैं, सैकड़ों छात्रों को पढ़ाते हैं—वे परिणाम आने के बाद केवल पाँच या सात बच्चों की तस्वीरें लगाकर स्वयं को “सर्वश्रेष्ठ” घोषित कर देते हैं।
बाकी छात्र कहाँ हैं?

क्या वे उसी स्कूल में नहीं पढ़ते थे?
क्या उनकी मेहनत कम थी?
क्या उनका भविष्य महत्वहीन है?
जब सैकड़ों छात्रों में से केवल कुछ टॉपरों को मंच दिया जाता है, तब अनजाने में यह संदेश दिया जाता है कि बाकी बच्चे महत्वहीन हैं। यही वह क्षण है जहाँ शिक्षा का उद्देश्य कमजोर पड़ने लगता है।
शिक्षा या प्रदर्शन?
विद्यालय का उद्देश्य क्या है ? टॉपर बनाना या इंसान बनाना?
हर बच्चा डॉक्टर नहीं बनेगा।
हर बच्चा इंजीनियर नहीं बनेगा।
हर बच्चा प्रशासनिक अधिकारी नहीं बनेगा।
लेकिन हर बच्चा एक नागरिक बनेगा। एक परिवार का सहारा बनेगा। समाज का जिम्मेदार सदस्य बनेगा।
आज 60% लाने वाला बच्चा कल सफल व्यापारी बन सकता है। 70% लाने वाला बच्चा सेना में जाकर देश की रक्षा कर सकता है। 75% लाने वाला बच्चा उद्योग स्थापित कर हजारों लोगों को रोजगार दे सकता है।
फिर उन्हें कमतर क्यों महसूस कराया जा रहा है?
मनोवैज्ञानिक दबाव का अदृश्य संकट
जब केवल टॉपरों को मंच मिलता है, तब बाकी बच्चों के मन में तुलना, हीन भावना और आत्मग्लानि जन्म लेती है। परिणाम का दिन कई बच्चों के लिए उत्सव नहीं, भय का दिन बन चुका है।
बच्चे सोचते हैं—
यदि 95% से ऊपर नहीं आया, तो मैं सफल नहीं हूँ।
यह सोच खतरनाक है। यह शिक्षा नहीं, मानसिक दबाव की व्यवस्था है।
विज्ञापन की विडंबना
परिणाम के बाद पूरे पेज के विज्ञापन दिए जाते हैं। बड़े-बड़े बैनर लगाए जाते हैं। लेकिन एक सच कोई नहीं बताता—उस विज्ञापन की फीस में उस बच्चे का भी योगदान है जो 35% से पास हुआ है, जो 40% से पास हुआ है या जो बैक लेकर बैठा है।
उसके माता-पिता ने भी फीस भरी है। उसकी मेहनत भी सच्ची थी। फिर उसका अस्तित्व विज्ञापन में क्यों नहीं है?
शिक्षण संस्थान या मार्केटिंग एजेंसी?
“हमारे 20 बच्चों ने 95% से ऊपर अंक प्राप्त किए।”
“हमारा रिजल्ट 100%।”
“हमारा टॉपर जिला टॉपर।”
इन वाक्यों का छिपा अर्थ साफ है—बाकी बच्चों की बात नहीं होगी।
विद्यालय वह स्थान है जहाँ हर बच्चे को महत्व मिलना चाहिए, न कि केवल उन बच्चों को जो पोस्टर पर अच्छे लगते हैं।
सफलता का वास्तविक अर्थ
जीवन की सफलता का प्रतिशत से कोई सीधा संबंध नहीं होता। जीवन में धैर्य, नैतिकता, मेहनत, नेतृत्व, सहानुभूति और संघर्ष क्षमता काम आती है। इनका कोई प्रतिशत नहीं होता।
बोर्ड परीक्षा जीवन की अंतिम परीक्षा नहीं है—यह केवल एक पड़ाव है।
अभिभावकों से अपील
अभिभावकों को बच्चों को यह सिखाना होगा कि अंक महत्वपूर्ण हैं, पर जीवन नहीं। तुलना प्रतिभा को मार देती है। आत्मविश्वास सबसे बड़ा प्रमाणपत्र है।
बच्चों को जीवन जीने की कला सिखानी होगी—खुश रहना, अच्छा इंसान बनना और समाज के लिए उपयोगी बनना ही वास्तविक सफलता है।
स्कूलों से सीधा प्रश्न
क्या आप टॉपर बना रहे हैं या समाज बना रहे हैं?
यदि परिणाम केवल पोस्टरों तक सीमित है, तो यह परिणाम नहीं—प्रचार है। यदि 90% वाला बच्चा भी खुद को असफल महसूस करे, तो यह शिक्षा नहीं—विफलता है।
अंतिम शब्द
अब समय आ गया है कि स्कूल नंबरों का बाजार लगाना बंद करें। हर बच्चे का सम्मान करें। हर सफलता को स्वीकार करें।
क्योंकि 60% वाला बच्चा भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना 100% वाला।
नंबर जरूरी हैं, पर इंसान उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।

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