उत्तराखंड
पिथौरागढ़
शिक्षा में एकरूपता, शुल्क में पारदर्शिता और उत्तराखंड की निजी शिक्षण संस्थाएँ ।
बयानों से बाहर आकर फीस एक्ट
क्यूं नहीं ला रही सरकार ।
नीति, नीयत और न्याय का प्रश्न ।
अभिभावकों के हितों की बात स्पष्ट होनी चाहिए।
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। यह केवल पुस्तकों, पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं का ढांचा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता का वह आधार है जिस पर भविष्य की इमारत खड़ी होती है। ऐसे में यदि शिक्षा व्यवस्था स्वयं भ्रम, विरोधाभास और राजनीतिक द्वंद्व का शिकार हो जाए, तो प्रश्न केवल विद्यालयों का नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज की दिशा और दशा पर उठ खड़ा होता है।
उत्तराखंड जैसे भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य में शिक्षा का प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है। यहां शिक्षा केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सीमांत गांवों में जीवन को थामे रखने वाली एक सामाजिक आवश्यकता है। ऐसे समय में शिक्षा नीति को लेकर उठने वाले विवाद—चाहे वह फीस नियंत्रण, पाठ्यक्रम की एकरूपता, या निजी विद्यालयों की भूमिका से जुड़े हों—सिर्फ प्रशासनिक विषय नहीं रह जाते, बल्कि गहन वैचारिक और संवैधानिक विमर्श की मांग करते हैं।
आज उत्तराखंड में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बिना फीस एक्ट लागू किए आखिर शुल्क निर्धारण किस आधार पर किया जा रहा है? एक ही जिले में चार प्रकार के विद्यालय—सरकारी, अनुदानित, कम लागत वाले निजी विद्यालय और अत्यधिक महंगे कॉर्पोरेट स्कूल—यदि समान शैक्षणिक दायित्व निभा रहे हैं, तो उनके लिए अलग-अलग मापदंड क्यों? यह असमानता न केवल अभिभावकों को भ्रमित करती है, बल्कि शिक्षा को एक अनियंत्रित बाजार में बदलने का खतरा भी पैदा करती है।
विडंबना यह है कि हर वर्ष प्रवेश सत्र प्रारंभ होते ही सरकार जागती है। बयान आते हैं, नोटिस निकलते हैं, शब्दों में “लूट-खसोट” और “माफिया” जैसे आरोप उछाले जाते हैं, परंतु स्थायी समाधान के रूप में फीस एक्ट लाने का साहस कोई नहीं करता। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार सचमुच शिक्षा में सुधार चाहती है, या फिर केवल तात्कालिक जनभावनाओं का प्रबंधन कर रही है?
शुल्क नियंत्रण का प्रश्न तभी न्यायसंगत हो सकता है, जब वह कानूनी ढांचे में हो। फीस एक्ट कोई निजी विद्यालयों के पक्ष या विपक्ष का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि वह अभिभावकों, छात्रों और संस्थानों—तीनों के अधिकारों और दायित्वों को स्पष्ट करने वाला एक संतुलित विधान होता है। बिना फीस एक्ट के शुल्क तय करना न केवल कानूनी रूप से कमजोर है, बल्कि प्रशासनिक मनमानी को भी जन्म देता है।
इसी तरह पाठ्यक्रम को लेकर चल रहा विवाद भी गहरे आत्ममंथन की मांग करता है। जब देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवाओं—आईएएस, आईपीएस, आईएफएस—के लिए एक ही पाठ्यक्रम है, तो स्कूली शिक्षा में यह एकरूपता क्यों असंभव मानी जाती है? भाषाई विविधता, स्थानीय इतिहास और संस्कृति का सम्मान अपनी जगह है, परंतु राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा शैक्षणिक आधार राष्ट्र की वैचारिक एकता के लिए अनिवार्य है।
“एक देश, एक पाठ्यक्रम” का विचार किसी सांस्कृतिक वर्चस्व का नहीं, बल्कि शैक्षणिक समानता का प्रश्न है। आज स्थिति यह है कि अलग-अलग बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग मूल्य संरचनाएँ बच्चों को प्रारंभ से ही आर्थिक और सामाजिक वर्गों में बांट देती हैं। शिक्षा, जो समान अवसर का माध्यम होनी चाहिए, स्वयं असमानता का उपकरण बनती जा रही है।
और इस पूरी बहस में सबसे विचित्र स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब एक ओर स्किल इंडिया, एआई, रोबोटिक्स और तकनीकी शिक्षा की बात होती है, और दूसरी ओर विद्यालयों में कंप्यूटर या सामान्य ज्ञान की पुस्तकें लगाने पर चालान की चेतावनी दी जाती है। क्या यह विरोधाभास नहीं कि जिन अभिभावकों को अपने बच्चों को प्रशासनिक सेवाओं में देखने का सपना दिखाया जाता है, उन्हीं से सामान्य ज्ञान की पुस्तकों पर आपत्ति जताई जाती है?
यदि बाजार में उपलब्ध पाठ्यक्रम अवैध हैं, तो प्रश्न यह नहीं कि विद्यालय उन्हें क्यों अपनाते हैं, बल्कि यह है कि उन्हें छापने और बेचने की अनुमति कौन देता है? पाठ्यपुस्तकें किसी गुप्त प्रक्रिया से नहीं आतीं। वे सरकार की स्वीकृति, पंजीकरण और वितरण प्रणाली से गुजरती हैं। फिर उनका मूल्य निर्धारण कौन करता है? और यदि एनसीईआरटी की पुस्तकें ही आदर्श हैं, तो उनकी समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
यह कहना कि निजी विद्यालयों ने शिक्षा में अनर्थ किया है, न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अन्यायपूर्ण है। उत्तराखंड के गांव-गांव तक शिक्षा की लौ पहुंचाने में जिन संस्थानों ने दान, चंदा और बैंक ऋण के सहारे अपने संसाधन खड़े किए, उन्हें आज संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। सीमांत जिलों में पलायन रोकने में यदि किसी का सबसे बड़ा योगदान है, तो वे वही निजी विद्यालय हैं, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा को सेवा भाव से जीवित रखा।
इसके विपरीत, सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुरक्षा मानकों की अनदेखी एक कड़वा सत्य है। न पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, न अग्निशमन, न चौकीदार, न ही कई स्थानों पर मजबूत भवन—इन सबके बावजूद सवालों के कटघरे में हमेशा निजी विद्यालय ही खड़े किए जाते हैं। संसाधन जुटाकर मानक पूरे करने वाले संस्थान “माफिया” कहे जाते हैं, और मानकों की अनदेखी करने वाली व्यवस्था मौन साध लेती है।
सोशल मीडिया के युग में सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक और सूचना अधिकार के नाम पर सक्रिय लोग भी अक्सर एकतरफा विमर्श को बढ़ावा देते हैं। शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर संतुलित दृष्टि के बजाय भावनात्मक उत्तेजना को हवा दी जाती है। यह न तो अभिभावकों के हित में है, न छात्रों के, और न ही समाज के।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि सरकार वास्तव में अभिभावकों को राहत देना चाहती है, तो फीस एक्ट लाने से क्यों हिचक रही है?
आंदोलनकारी, राजनीतिक दृष्टि से अपनी जगह तलाश रहे लोग, और स्वयं को शिक्षा का मसीहा घोषित करने वाले वर्ग—इनमें से किसी को भी यह दबाव बनाने की आवश्यकता क्यों नहीं दिखती कि उत्तराखंड में एक स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत फीस एक्ट लागू हो?
अभिभावकों को अंधेरे में रखकर मसीहा बनने का प्रयास बंद होना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि फीस एक्ट लागू हो, उसका सख्ती से पालन हो, और जो उसका उल्लंघन करें—चाहे वे निजी हों या सरकारी—उन पर समान रूप से कार्रवाई हो। यही शिक्षा में वास्तविक न्याय होगा।
एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स कमेटी, उत्तराखंड, स्पष्ट रूप से यह मानती है कि शिक्षा सुधार टकराव से नहीं, संवाद और विधिक स्पष्टता से आता है। हम शुल्क पारदर्शिता के पक्षधर हैं, पाठ्यक्रम की राष्ट्रीय एकरूपता के समर्थक हैं, और शिक्षा को उद्योग नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व मानते हैं।
हर वर्ष प्रवेश सत्र के साथ शिक्षा को लेकर जिस भाषा और शब्दावली का प्रयोग होता है, वह न केवल शिक्षण संस्थानों की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, बल्कि समाज में अविश्वास भी पैदा करती है। शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा नहीं, बल्कि नीति और नीयत की कसौटी बनाया जाना चाहिए।
यदि वास्तव में सरकार उत्तराखंड के भविष्य को सुरक्षित करना चाहती है, तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह निजी शिक्षण संस्थानों को समाप्त कर शिक्षा का दायित्व कुछ उद्योगपतियों के हाथों सौंपना चाहती है, या फिर उन संस्थानों के साथ मिलकर एक संतुलित, समावेशी और न्यायसंगत शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना चाहती है।
निर्णय अब भी संभव है—परंतु उसके लिए साहस, स्पष्टता और संवैधानिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।
डॉ. किशोर कुमार पंत
सोशल एक्टिविस्ट
(अध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स कमेटी, उत्तराखंड)














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