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पिथौरागढ़ पूर्व सैनिकों ने नही बनाया होली पर्व

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उत्तराखंड राज्य क पिथौरागढ़ जनपद में 

होली जैसे पावन पर्व पर, जब पूरा देश रंग और उल्लास में डूबा था, तब सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में पूर्व सैनिक अपने परिवारों से दूर, धरना स्थल पर डटे रहे।

यह त्याग केवल एक विरोध नहीं, बल्कि सैनिक धर्म, कर्तव्य और जनपद के भविष्य के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रमाण है।

सीमाओं पर वर्षों तक लहू बहाकर राष्ट्र की रक्षा करने वाले ये वही वीर हैं, जिन्होंने हर परिस्थिति में “देश पहले” को अपना मूल मंत्र माना।

आज वही पूर्व सैनिक 130 पर्यावरण बटालियन के विस्थापन के विरोध में इसलिए बैठे हैं,

क्योंकि उनके लिए यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सीमांत की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय रोजगार और जनपद की आर्थिक धुरी से जुड़ा प्रश्न है।

हम शासन-प्रशासन से कुछ मूलभूत प्रश्न पूछना चाहते हैं

क्या सीमांत क्षेत्रों की सामरिक और सामाजिक संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर लिए गए निर्णय राष्ट्रहित में हो सकते हैं

*क्या 130 पर्यावरण बटालियन का विस्थापन स्थानीय युवाओं के रोजगार और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा

*क्या पर्यावरण संरक्षण के नाम पर स्थापित बटालियन को हटाना “पर्यावरण सुरक्षा” की भावना के विपरीत कदम नहीं है

*क्या अरावली को बचाने के लिए हिमालय की बलि देना सही खत्म होगा


*जब पूर्व सैनिक अपने पर्व-त्योहारों का त्याग कर शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक धरने पर बैठे हैं, तो उनकी मांगों पर संवेदनशीलता से विचार क्यों नहीं किया जा रहा?*

पूर्व सैनिकों का यह संघर्ष किसी व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित नहीं है। यह संघर्ष उस सैनिक धर्म का विस्तार है,

जिसमें राष्ट्र, सीमांत और समाज की खुशहाली सर्वोपरि होती है। जिस प्रकार एक सैनिक सीमा पर अपने सुख-दुख त्याग देता है, उसी प्रकार आज ये पूर्व सैनिक अपने पर्वों की खुशियाँ त्यागकर जनपद के भविष्य की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हैं।

होली के दिन भी धरना जारी रहना इस बात का प्रतीक है कि यह आंदोलन भावनात्मक भी है और नैतिक भी। यह चेतावनी भी है और आह्वान भी —
यदि 130 पर्यावरण बटालियन के विस्थापन के निर्णय पर शीघ्र पुनर्विचार नहीं किया गया, तो यह जनांदोलन और व्यापक रूप लेगा।

हम आम जनमानस से अपील करते हैं कि इस संघर्ष को केवल सैनिकों का आंदोलन न समझें। यह जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण, युवाओं के रोजगार और सीमांत की अस्मिता की लड़ाई है।

पूर्व सैनिक संगठन का स्पष्ट संकल्प है —
सीमांत की सुरक्षा, पर्यावरण की रक्षा और जनपद के भविष्य के लिए यह संघर्ष अंतिम निर्णय तक जारी रहेगा।

आज धरने को समर्थन करने वाले पूर्व सैनिकों में ना सु नवीन गुरुरानी, प्रताप इग्राल,जग बहादुर,आनंद चौहान, राजेंद्र कार्की, महेश शाही,राजेंद्र जोरा, गोपाल सिंह, श्याम विश्वकर्मा सहित संगठन के सचिव कैप्टेन दयाल मेहता सहित दर्जनों पूर्व सैनिक उपस्थित रहे।

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